छठ पर्व : पंच ‘ज’ से तादात्म्य का उत्सव

डा. मीना जांगिड़ बता रही हैं कि छठ पर्व जनमानस के जीवन का लोकउत्सव है। यह उत्सव न केवल अपने इष्टदेव की श्रद्धा-विश्वास का उत्सव है बल्कि प्रकृति को जन से जोड़ने का पर्व है

हर ऋतु की कहानी अपनी जुबानी होती है। जिसमें छोटे-छोटे व्रत, त्योहार, उत्सव ऋतु के बदलाव के साथ जीना सिखाते हैं। इन्हीं उत्सवों में छठ पर्व भारत के बहुत बड़े जनमानस के जीवन का लोकउत्सव है। यह उत्सव न केवल अपने इष्टदेव की श्रद्धा-विश्वास का उत्सव है बल्कि प्रकृति को जन से जोड़ने का पर्व है।

छठ पर्व की परम्परा को देखें तो हम जानेंगे कि वास्तव में यह पर्यावरण मित्र त्योहार हमें प्रकृति के साथ एकाकार होने का सन्देश देता है। छठ पर्व को पूरी तरह प्रकृति संरक्षण की पूजा मानें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। वैसे भारत के लगभग सभी त्योहार ऋतुओं, फसलों और प्रकृति की समृद्धि के ही त्योहार ही हैं। छठ भी उनमें से एक है। छठ पर्व में मनुष्य सचमुच अपनी जननी प्रकृति की गोद में ही पहुँच जाता है। छठ के चार दिनों में वह किसी और की उपासना में नहीं बल्कि स्वयं को जीवन दात्री प्रकृति में ही खुद को स्थापित करता है।

छठ का पहला सन्देश है स्वछता। छठ के मौके पर सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है। घरों के साथ – साथ गलियों , सड़कें , बगीचे यहाँ तक कि नदियों ,जलाशयों की भी सफाई की जाती है। गाँव के पोखर और कुएं तक साफ़ किये जाते हैं। इसका यहां के लोकगीतों में भी उल्लेख मिलता है-“चाहे समंदर या तलवा तलैया, हर घाटे होखे ला छठ के पूजैया।

आज पूरी दुनिया में जल और पर्यावरण संरक्षण पर ज़ोर दिया जा रहा है। लेकिन हमारे पुरखों ने प्रकृति से यह तालमेल का यह खेल युगों पहले समझ लिया था। छठ पर्व में भी नदी , घाटों और जलाशयों की सफाई की जाती है। जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। सूर्य की छाया पानी में साफ़ – साफ़ दिखाई देनी चाहिए। सन्देश साफ़ है कि जल को इतना निर्मल और स्वच्छ बना के रखें कि उसमें सूर्य की किरण भी प्रतिबिम्बित हो उठें।

गउवां चाहे देख कौनी शहर, जयकारा ठहरे-ठहर मइया जी राउर सगरो…” बारिश के उपरांत नदी, तालाब ,पोखर बारिश के साथ बहकर आई मिट्टी, गाद से भर जाते हैं। लंबे समय तक जलाशय का पानी स्वच्छ रहे इस हेतु बारिश के साथ बहकर आए मैले, कूड़े-करकट को हटाना जरूरी होता है। कुछ दशकों पूर्व छठ पूजा हो या अन्य कोई उत्सव की तैयारी के लिए आज की तरह किसी प्रशासन का मोहताज नहीं था। जैसा कि छठ पर्व से पहले एवं बाद में समाचारपत्रों में बड़ी बड़ी हैडलाइन में प्रशासन की नाकामयाबी को दर्शाया जाता है। घाटों की साफ-सफाई न कराने के कारण श्रद्धालुओं को गंदे पानी मे खड़े होकर ही पूजा करनी पड़ी। इसे विडंबना न कहें तो क्या कहें कि समाज को पूजा-पाठ के लिए भी किसी और पर निर्भर रहने की आदत जो लग गयी है। हम त्योहारों का मूल भाव खोकर एक अजीब सी परिपाटी को निभाते से जा रहे हैं । हम तो उन पूर्वजों के वंशज है जहां कोई भी कार्य बिना किसी कल्याणकारी फल के सम्पन्न नहीं होता था। जहां समस्त संसाधन मिलजुलकर जुटाए जाते थे। किसी भी कार्य हेतु किसी अन्य तंत्र पर निर्भर रहने की अपने यहाँ परम्परा नहीं थी।

फसल की बुआई, निराई-गुड़ाई के होते ही किसान दीवाली एवं छठ पूजा के उत्सव की तैयारियों में लग जाते । आज जो कार्य अनेक बड़ी-बड़ी आधुनिक मशीनों से भी नहीं हो पाता वह तत्कालीन समाज की सहभागिता से देखते ही देखते हो जाता था। यह व्यवस्था इतनी सुंदर थी कि समाज का हर एक सदस्य इस पुण्य कार्य में जुट जाता था । प्रत्येक जाति एवं मोहल्ले के अपने-अपने घाट होते थे। विकेंद्रीकरण की इस व्यवस्था में नदी नाले एवं छोटे-छोटे पोखर की सफाई हो जाती थी। समाज में एक दूसरे से अपने घाट को स्वच्छ औऱ सुंदर बनाने की होड़ लगी रहती थी। छठ मैया के स्वागत में जलाशय से निकली गाद जलाशय की पाल को मजबूती प्रदान भी करती थी। ये सभी वहां के लोकगीतों, लोककथाओं में भी मिलता है। छठ घाट की सफाई से लेकर घाट से कंटीली घास-झाड़ियों को हटाना, मकड़ी के जाले साफ कर वहां फूल-पौधे लगाने के दौरान गीत गाया जाता है -“घटवा के आरी-आरी रोपब केरवा, बोअब नेबूआ…. कोपी-कोपी बोलेले सूरज देव सुनअ सेवक लोग, मोरे घाट दुबिया उपज गईले मकरी बसेरा लेले, वितनी से बोलेले सेवक लोग सुनअ ऐ सुरज देव, रउआ घाटे दुबिया छटाई देहब भगाई देहब….।”

गीत से यह भी स्पष्ट होता है कि कैसे साफ-सफाई कर जलाशय के किनारे पौधारोपण किया जाता था। आज की भांति प्रतीकस्वरूप केले की पत्तियां या अन्य सजावटी सामान से पूजा पाठ नहीं होती थी।

वर्षा के बाद समाज की दूरदर्शीता व्यक्त करते हुए ये व्रत-त्यौहार भारत के अलग अलग क्षेत्र में भिन्न -भिन्न रूपों में मनाए जाते रहे हैं। राजस्थान, हरियाणा एवं मध्यप्रदेश में कार्तिक कृष्ण एकादशी के दिन बच्चे, महिलाएं एवं पुरुष एकत्रित होकर गीत गाते हुए तालाब के किनारे से मिट्टी निकालकर पथवारी बनाते थे। पाल पर गुम्बदनुमा इस पथवारी में दीपक रखने के छोटे-छोटे आले( गर्त) बनाते थे। दीवाली के दिन इनमें दिए रखकर तालाब के किनारे गाते-पूजा करते हुए सुख-समृद्धि की कामना करते थे। समय के साथ यह पथवारी तालाब की पाल पर तालाब के रक्षक की भूमिका निभाती थी।

एक दौर था जब पंजाब के गाँवों में भी चोए – मोठे तीज त्योहारों के अवसर पर तालाबों से मिट्टी निकालने को बेहद शुभ माना जाता था। इसी प्रकार दशहरे के दिन ढिलोत्सव के दिन नदी या तालाब से निकाली मिट्टी की पूजा होती है। बरसात के पास जलाशयों की पहली साफ-सफाई का यह उपक्रम उत्तरपूर्वी भारत मे भी है जहां दुर्गा पूजन से पहले जलाशयों की सफाई अवश्य की जाती है।

बढ़ई, कुम्हार, मोची, आदि तो इन जलाशयों का हिस्सा होते थे। सुख और दुःख के सभी अनुष्ठानों में, जलाशयों के किनारों से मिट्टी निकाली जाती ताकि तालाब धीरे-धीरे और गहरे हो सकें, और गाँव का जीवन लम्बा हो सके। इन जलाशयों के समीप ठाकुर द्वारा शिवाला, देवी या थान (देवता का स्थान) अवश्य होता । लेकिन आज नई पीढ़ी ने इनकी उपयोगिता बेकार लगती है । नई पीढ़ी ने तालाबों को मिटटी से भरना और महंगे भूखंडों के रूप में ही बेचना ही पसंद किया। उन्होंने स्वीकार किया है कि धरती का मोल महंगे ‘भूखंडों से अधिक कुछ भी नहीं है।

पूरे भारत ऐसी अनूठी और सुन्दर परम्पराओं , तीज , त्योहारों और पर्वों से भरा पड़ा है। छठ पर्व के केंद्र में भी कृषि , मिटटी और किसान ही हैं। धरती से उपजी हर फसल और हर फल और सब्ज़ी हम सबका प्रसाद है। छठ सामजिक समरसता का सन्देश भी देता है। जिस डोम समाज को लोग अछूत मानते हैं ,उनके बनाये सूप के बिना छठ पर्व के रूप में संपन्न नहीं होता। कुम्हार द्वारा बनाये मिटटी के बर्तन , चूल्हे , दीये आदि की इस पर्व में विशेष अहमियत होती है। इसके आलावा नाईन , माली आदि की भी अहम भूमिका होती है।

प्रकृति की प्रतिष्ठा को स्थापित करने वाला छठ एक ऐसा पर्व है, जिसका नाम सुनते ही शरीर के अंग-अंग से आध्यात्म की सरिता फूट पड़ती है। खासतौर से उस दौर में जब दुनियाभर में प्रकृति-पर्यावरण को लेकर वैज्ञानिक समेत पूरा कायनात चिंतित है। सामूहिकता में मनाया जाने वाला लोकपर्व छठ संदेश देता है कि हम अपने आसपास हर दिन सफाई करें। पर्यावरण को बचाएं और प्रकृति पर मंडरा रहे खतरे को दूर भगाएं।

सूर्य जागृत ईश्वर है। इसीलिए छठ को प्रकृति पर्व कहा जाता है। सूर्य की पूजा से न सिर्फ मन व शरीर शुद्ध होता है बल्कि प्रकृति के करीब पहुंचने का अवसर मिलता है। इस पर्व की महत्ता धार्मिक के साथ वैज्ञानिक भी है। यह पर्व सामूहिक रूप से लोगों को स्वच्छता की ओर उन्मुख करता है। अर्थात प्रकृति को सम्मान व संरक्षण देने का संदेश भी यह पर्व देता है। आज जबकि पूरी दुनिया में पर्यावरण को लेकर चिंता जतायी जा रही है, तब छठ का महत्व और जाहिर होता है। इस पर्व के दौरान साफ-सफाई के प्रति जो संवेदनशीलता दिखायी जाती है, वह लगतार बनी रहे तो पर्यावरण का भी भला होगा। छठ पूजा की प्रक्रिया के बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे सेहत को फायदा होता है। सूर्य को अर्घ देने के लिए उपयोग में लाया जाने वाला हल्दी, अदरक, मूली और गाजर जैसे फल-फूल स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होते हैं। सूर्य की सचेष्ट किरणों का प्रभाव मनुष्य ही नहीं पेड़-पौधों पर पड़ता है। पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ देने से सूर्य की किरणें परावर्तित होकर आंखों पर पड़ती हैं। इससे स्नायुतंत्र सक्रिय हो जाता है और व्यक्ति खुद को ऊर्जान्वित महसूस करता है।

कृषक अपनी श्रमशक्ति से खेतों में वे जो कुछ उपजाते थे उन सबको पहले सूर्य देवता को भेंट के रूप में देते थे। इस पर्व के मौके पर जो लोक गीत गाये जाते हैं उनमें से कई गीतों के अर्थ कुछ इस प्रकार होते हैं- ‘हे देवता! नेत्रहीनों को दृष्टि दो, कुष्ठ रोगियों को रोगमुक्त कर स्वस्थ बनाओ और उसी तरह से निर्धनों को धन प्रदान करो। यही तुम्हारे रथ को पूरब से पश्चिम की ओर ले जाएंगे।’ गौर करें तो इस गीत में अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के पीड़ित और उपेक्षित लोगों के लिए नया जीवन मांगा जा रहा है।

कृषक समाज की संस्कृति में विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा उस समाज की संपूर्ण मानसिकता का प्रतिनिधित्व करती है। इसीलिए राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक जगत में अनेक तरह के परिवर्तन के वावजूद पर्व त्यौहारों का सिलसिला आज भी जारी है।

इस पर्व में प्रकृति और मनुष्य के एकाकार होने का भाव है। पूरे ब्रह्मांड या सौरमंडल के अधिष्ठाता सूर्य ही हैं जो पृथ्वी पर जीवन, जीवनाहार और ऊर्जा के स्रोत हैं। आखिर मनुष्य के जीवन का पालन पोषण व रक्षण करने वाले ऊर्जा स्रोतों के प्रति एकाकार हो जाने की अनुभूति या हाथ जोड़ कर या फैला कर स्वीकार करने की एक प्रविधि ही छठ पूजा है।

भारतीय संस्कृति में समाहित पर्व प्रकृति और मानव के बीच तादात्म्य स्थापित तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों को भी कल्याणकारी भावना के तहत आगे बढाती है। यह अनायास ही नहीं है कि छठ के दौरान बनने वाले प्रसाद हेतु मशीनों का प्रयोग वर्जित है और प्रसाद बनाने हेतु आम की सूखी लकड़ियों को जलावन रूप में प्रयोग किया जाता है, न कि कोयला या गैस का चूल्हा। इसके साथ ही घर-परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्यता से भी छठ पूजा का व्रत जुड़ा हुआ है। निसंदेह कह सकते हैं कि छठपर्व पंच ‘ज’ के तादात्म्य के रूप में पर्यावरण मित्र पर्व है।
(लेखिका दीनदयाल शोध संस्थान में एसोसिएट डायरेक्टर(रिसर्च) है। यह उनके व्यक्तिगत विचार हैं)

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