क्या वाकई यह किसान आंदोलन है या सच्चाई कुछ और है?

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अरुण आनंद इस आलेख के माध्यम से दिल्ली की सीमा पर कृषि कानूनों के विरोध के नाम पर आयोजित उस जमावड़े की सच्चाई की पड़ताल कर रहे हैं जिसे किसान आंदोलन का नाम दिया जा रहा है। क्या वाकई यह किसानों का आंदोलन है?

दिल्ली की सीमा पर लगभग एक सप्ताह से किसानों का जमावड़ा आरंभ हुआ है। कहा ये जा रहा है कि किसान हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा पारित तीन कृषि संबंधी विधेयकों के कुछ प्रावधानों का विरोध कर रहे हैं। दो प्रावधान मुख्य रूप से विवाद के केंद्र में हैं। कुछ किसानों का कहना है कि केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य समाप्त कर दिया है। केंद्र सरकार ने सार्वजनिक तौर पर उन्हें आश्वस्त किया है कि ऐसा नहीं हुआ है। दूसरा मुद्दा ठेके पर खेती का है जिसे कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग भी कहा जाता है। कृषि विधेयक का विरोध करने वालों का आरोप है कि निजी कंपनियां अब ठेके पर खेती के नाम पर किसानों की जमीन खरीद कर हड़प जाएंगी। केंद्र सरकार ने आश्वस्त किया है और कानून में प्रावधान भी यही बाताते हैं कि कंपनियों को नए कानूनों के तहत किसानों की जमीन खरीदने यां लीज़ पर लेने की अनुमति नहीं है। लेकिन विरोध अभी भी जारी है। दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में रहने वालों को खुलेआम धमकाया जा रहा है कि तुम्हारे लिए दूध, सब्जी, आवश्यक वस्तुएं लाने वाली सड़के सील कर देंगे। कारोबारी प्रभावित हो रहे हैं, दिल्ली की सड़कों पर पांच—पांच किलोमीटर लंबा ट्रैफिक जाम चल रहा है जिसमें एंबुलेंस भी फंस रही है और नौकरी—पेशा व दिहाड़ी मजदूर भी। कोरोना से रिकवर कर रहे आम आदमी के लिए यह दोहरी मार हो रही है। विडंबना देखिए कि दिल्ली में शासन कर रही आम आदमी पार्टी दिल्ली के निवासियों को राहत देने के बजाए स्वयं इस विरोध प्रदर्शन को पूरा समर्थन दे रही है और वे लंबे समय तक वहां जमे रहकर दिल्ली की सप्लाई लाइन का गला घोंट सके इसके लिए दिल्लीवालों के टैक्स के पैसे से सीमा पर जमी इस अराजक भीड़ को पूरी सुविधाएं भी मुहैया करवा रही है!

बहरहाल कानून की बात पर वापिस आएं तो इन कानूनों के प्रारूप पढ़ने से पता चलता है कि नए कृषि कानूनों के तहत किसानों को अपनी फसल कहीं भी बेचने का अधिकार मिल गया है, इससे पहले उन पर अंकुश था कि वे अपनी उपज केवल अधिकृत कृषि मंडियों में ही बेचेंगे। इन मंडियों पर आढ़तियों के एक वर्ग का प्रभुत्व था। यहां यह कहना भी गलत होगा कि आढ़तियों ने हमेशा किसानों का शोषण ही किया। कई जगह किसानों और आढ़तियों के संबंध ऐसे बन गए थे कि मुश्किल के समय आढ़ती किसानों को अग्रिम राशि देने में भी परहेज़ नहीं करते थे जो बाद में फसल की खरीद करते हुए हिसाब में ले लिए जाते थे। पर यह भी सच है कि कई मामलों में, खासकर मध्यम व सीमान्त श्रेणी के किसानों का शोषण भी कुछ आढ़तियों ने किया। कुल मिलाकर इन नए कानूनों से किसानों और आढ़तियों के बीच के संबंध इतने भर बदलेंगे कि अगर मंडी के बाहर किसान को बेहतर दाम मिल जाए तो वह अपनी फसल आढ़ती को न बेचकर वहां बेच सकता है। अगर आढ़ती उसे बेहतर दाम देता है तो फसल अभी भी कृषि मंडी में ही बिक सकती है।

तो सवाल ये उठता है कि दिल्ली की सीमा पर फिर यह जमावड़ा क्यों? किसान आंदोलन क्यों कर रहे हैं? सच तो यह है कि ये किसान आंदोलन नहीं है। इसका आरंभ तो संभवत: पंजाब में मोदी विरोध के कारण कांग्रेस ने किया पर लगता है कि अब यह हाइजैक होकर उन्हीं शक्तियों के हाथों में चला गया जिन्हें हम टुकड़े—टुकड़े गैंग के नाम से जानते हैं। यह नक्सलवादी तथा कट्टरवादी शक्तियों का गठबंधन है जो भारती समाज में अराजकता पैदा कर इस देश को कई टुकड़ों में तोड़ना चाहता है, इसे विदेशों में पाकिस्तान सहित कई भारत— विरोधी शक्तियों से हर तरहं की मदद मिल रही है।

क्या यह केवल संयोग है कि पिछले साल शाहीन बाग में भी इसी प्रकार का जमावड़ा साल में ठीक इसी समय आरंभ हुआ था? क्या यह संयोग है कि आम आदमी पार्टी व कांग्रेस ने उसे भी समर्थन दिया था और इस जमावड़े को भी उनका वैसा ही समर्थन मिल रहा है? क्या यह संयोग है कि वही कुछ खास नक्सलवाद समर्थक व कट्टरवादी चेहरे जो शाहीन बाग में नजर आए थे, वही किसानों के प्रतितिधि बन यहां भी नज़र आ रहे हैं? क्या यह संयोग है कि वामपंथी छात्र संगठन विभिन्न शिक्षण संस्थानों में इस जमावड़े को समर्थन देने के नाम पर छात्रों के जत्थे लाने की तैयारी में जुटे हैं? क्या यह संयोग है कि कई लोग छद्म नामों से सोशल मीडिया पर खुद को किसान बताकर अराजकता फैलाने वाले पोस्ट कर रहे हैं?

वास्तव में न शाहीन बाग आंदोलन था, न इसे आंदोलन कहना उचित होगा। लेकिन फार्मूला दोनों जबह एक ही है। यह चंद अराजक तत्वों द्वारा कुछ खास इलाकों से इकट्ठी की गई भीड़ है। मूलत: इसमें पंजाब के जाट सिक्खों एक बहुत छोटा तबका शामिल है जो राजनीतिक कारणों से यहां आकर जम गया है। जमीन पर जाकर देखेंगे तो पता चलेगा कि इस विरोध प्रदर्शन में राय सिख किसान,रामगड़िया सिख किसान,कुम्हार सिख किसान, वाल्मीकि किसान, निर्मला सिख किसान,राधास्वामी सिख किसान, बागड़ी किसान शामिल नहीं है। इसी प्रकार गैर—सिक्ख किसानो में से कम्बोज किसान, नामदेव किसान, रवीदासीय किसान व अन्य पिछड़ी जातियों सहित अधिकतर आर्य समाजी किसान,राजपूत किसान आदि शामिल नहीं है। इस भीड़ में पंजाब के (भारत-पाक) सीमा के साथ लगते गांवों का किसान भी शामिल नहीं है। देश के किसी भी और हिस्से से किसानों का समर्थन इन्हें नही मिल रहा है हालांकि अभी टीवी कैमरों के लिए कुछ लोगों का जुगाड़ किया जा रहा है ताकि इसे एक बोगस अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने का ढोग रचा जा सके। इस विरोध प्रदर्शन को समर्थन क्यों नहीं मिल रहा है? क्योंकि अधिकतर किसानों को पता है कि उन्हें बरगलाया जा रहा है। हालांकि इस भीड़ में बहुत से ऐसे किसान भी आ गए हैं जिन्हें बरगला कर लाया गया है। कई टीवी रिपोर्ट में यह सामने आया है कि उन्हें इन कृषि कानूनों के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
अब सोचिए कि पंजाब में मलेरकोटला के मुसलमान किसानों इस भीड़ में क्यों शामिल हैं जबकि उनमें से ज्यादातर तो सब्जी उत्पादक हैं। न उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य से कोई लेना—देना है न ठेके पर खेती से! कुछ और दिलचसप तथ्य भी हैं जिससे इस भीड़ को एकत्र करने का उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है। इस विरोध प्रदर्शन में जम्मू कश्मीर में गुरमुखी को सरकारी भाषा के तौर पर शामिल ना करने का विरोध किया गया। किसानों के तथाकथित आंदोलन में जम्मू कश्मीर का मसला क्यों उठा? धारा 370 जैसी अलगाववाद समर्थक धारा को हटाने का विरोध भी इस तथाकथित आंदोलन में हुआ। अब भला कृषि कानून के विरोध प्रदर्शन में धारा 370 के मुद्दे की क्या आवश्यकता? मतलब मंशा किसानों का हित नहीं कुछ और है। इसी विरोध प्रदर्शन में लव जेहाद पर अंकुश लगाने के लिए लाए गए कानूनों का विरोध क्यों किया जा रहा है?
भाजपा विरोध के चलते विपक्षी राजनीतिक दल अभी भी आंदोलन के नाम पर अराजकता फैलाने के इन प्रयासों का लाभ उठाने का प्रयास कर रहे हैं। भारतीय राजनीति के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण संकेत भी है और खतरनाक भी। अगर आप कृषि कानूनों से सहमत नहीं है तो ज़रूर विरोध करिए, लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सभी को है। पर अराजकता फैला कर देश को तोड़ने वाली शक्तियों के षड्यंत्र और व्यापक हित के लिए लोकतांत्रिक विरोध में फर्क तो करना ही होगा।
(यह आलेख पहले दैनिक स्वदेश के ग्वालियर संस्करण में प्रकाशित हुआ था )
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